Tuesday, 10 May 2016

आज बारिश है

आज बारिश है
सारे ख़्वाबों को भिगोने,
सारी हसरतों को इक धागे में पिरोने की साजिश है
आज बारिश है

बरस रहे हैं बादल कुछ बेरुखी से
पूछा भी नहीं इक बार जमीं से
बस कर ऐ बादल, जमीं की गुजारिश है..
आज बारिश है.

बहलाकर लाये हैं बादल पानी को साहिल से
जो बरसा है टूटकर दीवानी घटाओं से मिल के
अब फिर कभी आना , दीवानों की सिफारिश है

आज बारिश है

क्या करें क्या न करें

आँखें बोलें मेरी तुम्हें देखा करें,
आहें बोलें मेरी तुम्हें चाहा करें...
            कश्मकश है बड़ी, तुम्हें लेकर हमें,
             कि इबादत करें या कि शिकवा करें..

इश्के उल्फ़त पर फ़ना होने वाले सभी,
दिवानों के संग हम बैठा करें...
        अक़ीदत है फिर भी, क़यामत है ये
        उनकी सोहबत से कुछ भी ना सीखा करें

गुज़रना पड़ा था इक गली से कभी
उस गली को ही मंज़िल अब जाना करें

मुस्कुराहट तो जैसे कि खिलती किरन 
हम चोरी छिपे नज़रें सेंका करें
         बेरुख़ी भी तुम्हारी ग़जब ढा रही...
          तुझमें क्या है  अलग हम सोचा करें,
        
तस्वीरें कई हैं, मेरे घर में तेरी...
बड़ी शिद्दत से उनको संभाला करें,
          हो जाओगे बेफ़िक्र अपना वादा है ये
          इससे बढ़कर तुम्हें क्या बताया करें

तौल लेना कभी तुम शराफ़त मेरी
वफ़ा बेवजह हम ना गाया करें
         कर लीं हैं बहुत...मिन्नतें अब तेरी
         तेरी मर्जी है ...जो तू ना आया करे

देख लेना मगर, ग़र ज़रूरत पड़े....
तेरा हक़ है, मुझे तू बुलाया करे..!

Monday, 9 May 2016

Munaasib hai

Raahon ke guzarne pe gham kaisa
Aage badhna hi munasib hai

Manzilon ki chaah rahti hai sabko
Daur to aate jaate rahte hain...
Gham-E-daur bhi aana munasib hai

Tu akela kabhi tha hi nahi..
Pal pal kuchh saaye, pichha karte rahe hain
Ab un saayon ka saaya padna munasib hai

Rahi zindgi hairan, pareshaan zindgi bhar
Gar,  zindadili hi zindaa rahi 
To tera zindaa rahna munasib hai



बाकी था, बाकी है..

तुम आये, हमने देखा,
     तुमने बोला, हमने सुना...
फिर क्या, मेरे साथी रह गया था !
      
      हर वक्त, हर लम्हा,
       हर सांस, हर साज़...
 सब तुमसे और तुम्हारा हो गया था !
       
        कुछ रातें, कुछ बातें,
        कुछ अनकही सौगातें...
देनी हैं तुम्हे, जो बाकी रह गया था !
        
        हम बेबस, हम पागल,
        हम बेचैन,हम घायल...
सब हुए थे हम, और मन जज़्बाती रह गया था !
        
        एक इकरार, एक इज़हार,
        ज़िंदगी भर का इंतज़ार..
ही बाकी था "हमेशा", और अब भी बाकी रह गया था..!!

       

Saturday, 7 May 2016

माँ

हे ! जननी...
इस जीवन का है भार बड़ा
ये जीवन तेरा साया है,
   तेरे साये की छाँव तले....
   रहना है....कर उपकार बड़ा ।

हे ! जननी ...
ज्यों पंछी बिना परों के हों,
ज्यों रात अमावस वाली हो..
   ज्यों सूर्यग्रहण का दिन हो वो
   तेरे बिन मैं हूँ, रिक्त घड़ा ।

हे ! जननी..
तूने पाला, तूने समझा,
तूने ही मुझे सँवारा है...
    तेरे ऊपर क्या लिक्खूँ मैं
    नतमस्तक हूँ, एकान्त खड़ा

हे! जननी....

जो संग वो खड़ी थी

जो संग वो खड़ी थी..

मेरे जन्म की वो शुभघड़ी थी
मैं रोया था जब, तो वो रो पड़ी थी
जो संग वो खड़ी थी

पाठशाला से पहले गुरू वो मिली थी
हर जुबाँ याद हैं ज्यों, अभी कल पढ़ी थी
जो संग वो खड़ी थी

बड़ा जब हुआ मैं, हमराज़ बन गई वो
कही दिल की सब, जो जरूरी बड़ी थीं
जो संग वो खड़ी थी

सिरहाने आज भी वो, बैठ जाती है जब
लगे हर बला भी, हाथ जोड़े खड़ी थी

जो संग "माँ" खड़ी थी...

कुछ की कमी हो गई

कुछ मिला तो ..'कुछ' की कमी हो गयी
आँखें सूखी ही थीं, कि फिर शबनमी हो गई

 जुस्तजू तो हकीकत में कुछ भी नही
 बेवजह ख्वाहिशों की जमीं हो गयी

मुकर्रर हुईं थीं, हमारे लिये
उन गिरहों की फिर से लड़ी हो गयीं

बाखबर, बासबब सब तो रहते हुए
बेशिकन ही रहे, तुम हमीं हो गये

चमकते हुए रास्तों पर जो गये
वो राहें अचानक....अनमनी हो गयीं

जिस्म लेकर हमारा, हम कब तक चलें
जिस्म जर्जर, तो रूहें थकी हो गईं....।