Thursday, 12 January 2017

Darr

Jab nhi dikhayi deti hai parchhayin tak..
Aas paas kahin
Dhadkan bhari ho is khauf se..
Ki kahin vo anjana sa dar,
Naa aa jaye saamne..
Us pal..
Jo aata h saamne, dost ho ya dushman..
Rakh kar apni anaa, apni shaakh ko taak par..
Jalne lagte hain hum..
Dheemi dheemi lau mein..
Dhadkanon ka bhaaripan
Dhuaan ban kar udne lagta hai
Maan lete hain dushman ko bhi humraaz..
Hawaale kar dete hain uske
Apni dil ki sooni haweli ko..

Aur fir...
Fir, kuchh palon baad...
Mehsoos ho jati hai vo galti
Jo kabhi nahi ki jaani thi..
Kabhi nahin..!!
Vo aag, vo bhaaripan,, jo pehchaan tha..
Vajood tha.....
Kho chukaa hotaa hai.. !!


जब नहीं दिखाई देती है परछाईं तक..
आस पास कहीं..

धड़कन भारी हो इस ख़ौफ़ से,
कि कहीं वो अंजाना सा डर,
ना आ जाये सामने..
उस पल...
जो आता है सामने,दोस्त हो या दुश्मन..
रख कर अपनी अना..
अपनी शाख़ को ताक पर
जलने लगते हैं हम..
धीमी धीमी लौ में..
धड़कनों का भारीपन..
धुआँ बनकर उड़ने लगता है,,
उस पल ..
मान लेते हैं दुश्मन को भी हमराज़
हवाले कर देते हैं उसके..
अपने दिल की सूनी हवेली को...

और फिर,
फिर कुछ पलों बाद...
महसूस हो जाती है वो ग़लती..
जो कभी नहीं की जानी थी,
कभी नहीं..!!
वो आग, वो भारीपन.. जो पहचान था..
वजूद था..
खो चुका होता है...

Friday, 6 January 2017

मेरे मालिक !

जिस दिन परदे का उठना होगा..
मेरा क़िरदार से बाहर आना होगा
उतरकर मंच से..
उतारकर नक़ाब को
हाथ उस शख्स से मिलाकर
एक बार पूछूँगा मुस्कराकर..

कहो! कुछ बाकी रह गया क्या ?
मैंने जी लिया वो किरदार
रो लिया, हँस लिया.. और,
हँसाया, रुलाया तमाम चेहरों को..
क्या अब भी कुछ बाकी है ??
देखो,, कितना इत्मिनान महसूस हो रहा है..
होने दो अभी..
कुछ पल तो सुकून से, सोने दो अभी..
हाँ, जो गलतियाँ इस किरदार में कर दी हैं मैंने..
हरजाना तो देना होगा..
पूरा वो करने के लिये..
किसी किरदार में, फिर से आना होगा..!

बस दरख़्वास्त मेरे मालिक एक मान लो !
दे दो साथ फिर से उन्हीं साथियों का...
जो साथ थे मेरे उसी मंच पर..
जो अब है सूना, मेरे यहाँ होने पर

हो सके तो किरदार छोटा देना...
थक गया था इस बार.. थोड़ी मोहलत देना..
देना ऐसा, कि सबकी आँखों में पानी हो..
जब वापस लौटूँ...
 मैं उन्हें, वो मुझे पुकारें...
मेरे वहाँ ना होने पर..
मुझे रूहानी शोहरत देना !!

Wednesday, 7 December 2016

धुँधला अक्स

हकीकत की कहानी थी
मोहब्बत से सुनाई थी
नज़र में कोई साया था
नज़र जिसने लुभाई थी

मैं बाकी था कहीं तुझमें
ये मन मेरा बताता है
तू मेरी जिंदगानी में
भी शामिल था, ये गाता है..

बरसती ठंडी रातों की 
बही ठंडी हवाओं से
जो झर झर बहता जाता था..
वो सावन गुनगुनाता है

ठहर जाते थे तब पंछी
छतों पर गुनगुनाने को..
मेरे नग्मों में तेरे लफ्ज
होते हैं, बताने को..

कली बागों की खिलती थी
सुबह रंगीन करती थी...
पहर शब का निराला था
वो शम्मा ख़ूब जलती थी..

चाँद करता था निगरानी
जुगनुएँ खेल करती थीं..
चाँदनी आके आँगन में
हमारे जिस्म मलती थी...

वो मौसम और वो रातें
कहाँ बाकी हैं अब बोलो
तुम्हें कोई मोहब्बत की
कहानी याद हो, बोलो

के अब कोई मुसाफिर अजनबी
सा है मेरे दिल में
नहीं करता जो अब शिकवा
वो धुँधला अक्स है दिल में.. 

कहे कोई के मेरे हो तो
मैं फिर से ठहर जाऊँ..
मोहब्बत ना सही लेकिन
मैं उस रस्ते गुज़र जाऊँ..
                       

कहानी-- फासला

पिछली दफा जब वो मिलकर आया था निदा से.. तो हफ्तों तक खाना अच्छा नहीं लगा था उसे ..
उसने देखा था खिड़की से निदा की थाली में झाँककर.. एक सूखी रोटी, जो आधी उसी थाली पड़ी पानी-पानी सी दाल में भीग चुकी थी।
चार सालों से, निदा को वापस लाने की उम्मीद से वह पागलखाने के चक्कर लगा रहा था..और मिलता क्या... हर बार सिर्फ नाकामी !!
कुछ सालों पहले निदा गिड़गिडाती थी .. हमीद जितना जल्दी हो सके... वापस आ जाना..
हमीद का जवाब होता - "मैं कोशिश करूँगा निदा..  यहाँ अम्मी अब्बू हैं, आपा के बच्चे मेरे बगैर रहते नहीं.. एक बार आपा को उनके सुसराल भेज दूँ, नौशाद भी भाईजान ये काम, वो काम करता रहता है..... तुम चिंता न करो, मैं आ जाऊँगा "
निदा हमीद से बेइंतहा प्यार करती , उसके बिना जैसे दिन रात थम जाते थे.. और हमीद को घरवालों की खिदमत से फुर्सत ना मिलती !
ये दूरी और नाउम्मीदी निदा के सब्र पर भारी पड़ती गयी । धीरे धीरे चिड़चिड़ाहट और घबराहट बढ़ने लगी... हमीद की जिम्मेदारियाँ ख़त्म ना हुईं !
निदा को अब खाने पीने, घर परिवार और खुद की भी खबर ना रहने लगी .. !
और फिर, हमीद जब जिम्मेदारियों से फुर्सत पा वापस आया भी तो, निदा निदा नहीं रह गयी थी.. !! हमीद को अंदाज़ा ही नहीं था कि ये फासला इतना लंबा हो जायेगा, कि जिसपर सफर करते करते वह उसी राह में निदा को खो देगा..!
अब, अब हमीद उसी घर में निदा का इंतज़ार उसी बेसब्री से कर रहा है, जैसे कभी निदा किया करती थी.... 

Sunday, 6 November 2016

पलकें



देखो कभी इक बार झाँककर
मेरी निश्छल आँखों में ..
क्या रक्खा है झूठी दुनिया में...
और दुनिया की उड़ती राखों में..

मेरी आँखों की खिड़की से...
देखो मन मेरा, देखो अंदर की हस्ती को
छूकर रो दोगे तुम मुझको,
भूलोगे हँसती बस्ती को..

चाहोगे निकलना जब बाहर..
अँधेरे कोनों से डरकर
सोचोगे मुझे मैं क्या हूँ और क्यूँ..
फिर देखोगे मुझे आँखें भर भर

अधखुली खिड़कियों से भी तो
आते हैं स्वप्न लगाकर पंख..
ये वो पंछी हैं जिनके ऊपर..
ना छत कोई ना है कोई कर

खिड़कियाँ यूँ ही बस बनी रहीं..
जाने क्या आना बाकी है
ना बंद हुईं ना खुली रहीं
अब कौन प्रतीक्षा बाकी है ?

तुम वो कहानी लिखो..

मैं किरदार हूँ जिसका.. तुम वो कहानी लिखो

लिख दो तकदीर मेरी किसी कागज के टुकड़े पर..
लगा दो रंग मेरे कागजी मुखड़े पर ...
सुन लो उन आवाज़ों को जो कैद हैं काली स्याही में..
बिखरी बिखरी साँसों की रवानी लिखो..
तुम वो कहानी लिखो ....

रहा गाफ़िल मैं अपने एहसासों से
करता रहा उम्मीद ठंडक की.. सिर्फ प्यासों से..
तुम लिखो गीली मिट्टी.. बारिश सुहानी लिखो
तुम वो कहानी लिखो ...

मेरे चंद जख्मों की परवाह न करना
कुरेद देना फिर से, हाँ, आह न करना..
फिर सीकर दोबारा लफ्ज़ों में
जख्मों की जवानी लिखो,
तुम वो कहानी लिखो

वो किताब तुम सरेआम कर देना
महफिल में मुझे बदनाम कर देना
कह देना मुझे पागल.. दीवानेपन की निशानी लिखो

तुम वो कहानी लिखो
मैं किरदार हूँ जिसका

Karne Do...

Mai kho jata hun aksar unhi khwaabon mein,
Jo chhuu kar guzrate hain tere khwaabon ko..

Kyun hai aisaa.. mujhe sawaal karne do..

Aa jaaun tum tak tumse bina puchhe
Uljhaa dun tumhe apne sawaalon ke pichhe,
Fanaa kar dun khud ko tum mein

Kuchh yun pareshaan karne do..