Friday, 6 May 2016

Baat

Kitni shaamein guzri hain
Kitni subahein beet gayin
Vo baat jahan par thahri thi
Vo baat vahin par baith gayi

     

Thursday, 5 May 2016

रुक जाओ अभी..

रुक जाओ अभी कुछ कहना है
थम जाओ अभी कुछ कहना है...
उस दिन की बात अधूरी है
इस रात का भी कुछ कहना है..

 अब जब तुम पास मेरे हो तब,
कुछ समझ नहीं बाकी मुझमें....
मैं क्या बोलूँ, क्या ना बोलूँ, 
इस बात का फिर से रोना है ।

जज्बात मेरे तुम जान गये ,
फिर भी तुम क्यूँ चुप बैठे हो !
 जो कहना है, तुम ही कह दो ...
ये लम्हा अब ना खोना है ।

इन हाथों को क्यों बाँधे हो...
क्या भूल गये, क्या बोला था!
 "मेरे हाथों को लेकर तुमको..
मेरी आँखों में खोना है..."

एक बार जरा तुम छू लो तो
सारी मुश्किल हल हो जाये
मेरी  साँसों को साँस मिले
जिन साँसों को अब खोना है

रुक जाओ अभी कुछ कहना है ।
थम जाओ अभी कुछ कहना है....!!





मगर

1. 
क़ब्र पर सिर रखने से क्या होगा...
कोई रहता है वहीं पर उठता नहीं !

2.
मुक़म्मल जहाँ में शिक़वे हज़ार हैं
ग़मज़दा हैं सब, कोई कहता नहीं !

3.
उस मोड़ से मुड़ती है ज़िंदग़ी इस क़दर..
रात दिखती है मगर, दिन होता नहीं..!

4.
निगाहों ने देखें हैं नज़ारे कई
जो चाहा मगर वो दिखता नहीं....!!

कोयल :)(:

चंचल पत्तों से हो हताश,
बोली कोयल करके विलाप...

क्यों तुम मुझ पर हँसते हो,
     मेरा कोई, न घर न बार..!
परिहास सदा क्यों करते हो
    
हर पंछी का है अपना राग,
    मैं हूँ श्यामा, है मधुर राग...!
वृक्षों पर बैठ कर करती हूँ 
इस जग का नित नया साज
    
बस हृदय लुभाती हूँ सबका,
    करती न नीड़ का इक प्रयास..

हर साल नये तुम उगते हो.
फिर मुझसे शोभा पाते हो

  फिर क्यों तुम मुझ पर हँसते हो


बोलो ये कैसा हो

   तुमसे तुमको माँगा है
   बोलो ये कैसा हो,

रंग भरे अरमानों पर, 
कुछ गीत प्यार के सज जायें..
   उन रंगीले गीतों में भी, 
   कोई अफसाना तुम सा हो

अंजानी बातों से ही,
आने वाला कल पहचानें ...
हम आज जियें, हम आज मरें
फिर ना जाने कल कैसा हो..
   
 रुख़ मोड़ लिया जब दुनिया से,
     फिर तुम क्यूँ आये आगे..
अब सोच लिया हमने ऐसा,
कोई साथ हमारे तुम सा हो

 देखो तुम भी कुछ समझो तो !
  अपनी बंजारन धड़कन से..
वो बोल रही "तुम भाग रहे" 
ना कोई तुम्हारे जैसा हो...
  
तुम भी दे दो, ख़ुद को मुझको
   फिर कोई अफसाना हो वो,
जो दरिया साहिल जैसा हो..!!
  
तुमसे तुमको माँगा है,
अब बोलो ये कैसा हो..!!

'Gar aisa Hota

बंजारों से दौड़ते ख़यालों को काफ़िला मिलता,
रूह को, बदन के बंधनों से फ़ासला मिलता
  नज़र आता कोई अंधेरे में भी ग़र....
रात को आफ़ताब का आसरा मिलता..!

क़िताबों की तहों में दफ़न हैं जो फूल,
साँस लेकर उन्हें, बिखरने का हौसला मिलता..

जज़्बा ए ज़िक्र की सरेआम तौहीन न होती,
गुल-ए-यकीं ग़र , हमारे दरम्यां खिलता....
दिलों के सौदे को यूँ हीं नहीं किया करते..
जाकर देख ऐ पागल ! दूजी दुनिया में
जहाँ ख़ुदा भी समझकर फ़ैसले करता..!     

कब तक

कब तक ज़िद लिये बैठे रहोगे
     वहाँ नूर है, जन्नतों का समाँ है
     उसकी रूह पर ख़ुदा का इमाँ है
यादें उसकी लिये रोते रहोगे

हर शख्स यहाँ आया है, कुछ पल के लिये
राह छोड़ेगा वो, फिर ना मिलने के लिये
   कब तक गुमराह तुम होते रहोगे
   कब तक ज़िद लिये बैठे रहोगे

 आसमाँ के सिकंदर को मना पाना मुमकिन नही
सोचोगे,
तुम पा लोगे उसे लेकिन नहीं
   जर्ज़र जिस्म लिये थकते रहोगे
   कब तक ज़िद लिये बैठे रहोगे

 कभी ख़्वाब देख लेना, भले झूठा ही सही
दिल को संभाले रखना, वो टूटा ही सही
    हो दुनिया में तो दिखते रहोगे
    कब तक......