Sunday, 6 November 2016

Ae Dil !!

Sadaaein aati rehti hain door se sabr rakhnaa...
Ae dil ! Tu ghabrana mat...

wafaayein laazim hain par zara door se,
Saath dena mera, tu ghabraana mat
Utaar lenaa hoga mujhe khud ko uski nazro'n se...
Tu thamm saa jaana.. ghabraana mat
Nikaal kar tujhe uske dil se laaungaa mujh tak... sabr rakh..

Tu tuut naa jaana.. ae dil !  Tu ghabraana mat
Deewaano'n ki mehfil mein rehte rehte...
Deewana jo ho gaya hai tuu...

Tujhe samajhtaa hun mai.. ae dil ! tu ghabraana mat..

Sunday, 16 October 2016

TO SHOR KYUUN HO

Jo hum karein aitebaar
To shor kyuun ho
Jo hum karein intezaar
To shor kyuun ho

Kya nahi aate ab koi sailaab
Kya poore nahi hote ab khwaab
Manzilein milein naa milein...
Mil to jaayeinge...
Naqaamiyon ke jawaab

Jo Hum chalein raah pe bebaak ...
To shor kyuun ho..





Saturday, 15 October 2016

तब्दीली

नीरजा ने खुद को आईने में देखा...
आँसू पोछे, चश्मा लगाया, घड़ी उठाई और चल पड़ी..

रेस्टोरेंट पहुँचकर.....
खूबसूरत लड़की से-

 "हाय बानी .. लुकिंग ब्यूटिफुल इन सारी...."

"थैंक्स.. बट....डू आई नो यू ?"

"मैं नीरज "
वो बैठते हुए बोली -

"क्क क्या ???"

-"हाँ , नीरज....नीरजा, कुछ भी कहो । मैं जानता थी, आई मीन जानती थी, तुम मुझे पसंद करती हो लेकिन....
बानी.. मुझे लड़का होना अभिशाप लगता था.. इसलिये लड़की बन गयी... अब यही पहचान है मेरी ... "

बानी उसे देखती ही रह गयी ।

-"मैं खुश हूँ नीरज.... तुममें इतनी हिम्मत है कि तुम दुनिया से लड़े .....औ.. र ..."
उसका गला भर आया....

दोनों देर तक खुशी और दर्द के घेरे में बैठे रहे...!


विश्राम- एक बोध

परमार्थ करना अच्छा है पर क्या अपने परिवार को कष्ट देकर ?
तारा चारपाई पर बैठी घंटो से इसी उधेड़बुन में लगी है ! 
माँ-बाप ने तीर्थ ही घर बना लिया, भाई पर उसकी ज़िम्मेदारी डालकर....
और भाई.... प्रेम में असफल होने के बाद वैरागी बना जाने कहाँ फिरता होगा .. ।  
कहता था सब मोह माया है ।
प्रेम की असफलता से उपजे मोह के वशीभूत होकर ही यह मार्ग चुना था...और ये तर्क !!

तारा बेमन से उठी,  द्वार तक गई.....शायद कुछ आहट हुई थी.. ।
देखा साधु है कोई ....तारा की ही तरह वृद्ध..

साधु - " तारा ! मुझे विश्राम चाहिये अब "
तारा रो पड़ी..पहचान गयी ।

Friday, 30 September 2016

हाल

हवाओं से हम पूछ तो लें हाल तुम्हारा ..
डरते हैं.. बदले में क्या हम बता पायेंगे ?

चाहते हैं बाँट लेना हर गम तुम्हारा...
पर हम तुम्हें अपने गम ना दे पायेंगे

तुम रहो तुम्हारी दुनिया में..बेफिक्र होकर
हम बस याद कर तुम्हें बेचैन हो जायेंगे..

जाते-जाते...मुड़कर देखा ही क्यूँ था तुमने
तुम जानते थे...हम तुमको ना भूल पाएँगे...

हद-ए-वीरान तक फिरता था दिल आवारा...
अब पास है तुम्हारे.. वापस ना ला पायेंगे

Ajnabeeyat

Har simt aawazein pehchaani hain
Par ilm nahin, shaklein anjaani hain

Kahin koi pukaare.. hum bulaate hain
Kahin hum nihaarein.. sab duur jaate hain..

Ajeeb hain lamhe jo guzar rahe hain..
Hum hum hi se dar rahe hain...
Kahin ye badhawasi pair naa jama le..
Hum bekhud ho jayein aur kahin dil laga lein..
Qadam chalte chalte ab thehar rahe hain

Zindagi ke saaye to hain dikhaayi dete
Zindagi ke qadam lekin nazar nahin aate....

हर सिम्ट आवाज़ पहचानी हैं..
पर इल्म नहीं, शक्लें अंजानी हैं

कहीं कोई पुकारे.. "हम बुलाते हैं"
कहीं हम निहारें..सब दूर जाते हैं

अजीब हैं लम्हें जो गुज़र रहे हैं...
हम, हम ही से दूर रह रहे हैं

कहीं ये बदहवासी पैर ना जमा ले ...
हम बेखुद हो जायें और 'फिर' दिल लगा लें
कदम चलते चलते अब ठहर रहे हैं...

ज़िंदगी के साये तो हैं नज़र आते...
कदम ज़िंदगी के लेकिन..नज़र नहीं आते

Saturday, 17 September 2016

नीली धूप

एक शाम फिर से क़रीब आ रही
आवारगी, नाराज़गी...कुछ तो करने अजीब आ रही

इल्ज़ाम फिर से किसी और पे आयेगा...
करती है मदहोश....
 अब और, करने आ रही

एक टेबल, दो कप, दो कुर्सियाँ हैं
कोई नहीं है...हवा की सरसराहट ही चुस्कियाँ हैं

यहाँ झाँकती है धूप नीली नीली

टकराकर झरोखों से, सुबह शाम अकेली,..
मैं भी इस्तक़बाल करता हूँ, सज़दे में झुक जाता हूँ..

मुस्कुराता हूँ उस पर, सभी परदे हटाता हूँ....


बिठाता हूँ नज़दीक ख़ुद के, और तन्हाई मिटाता हूँ